बुधवार, दिसंबर 31, 2025

मध्य-युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य

यह आलेख डॉ. सावित्री सिन्हा की लिखी और 1962 में नेशनल पब्लिशिन्ग हाउज़ द्वारा छापी पुस्तक "ब्रज भाषा के कृष्ण भक्ति काव्य में अभिव्यंजना शिल्प" की भूमिका का एक अंश है। आप चाहें तो इस पूरे आलेख को कल्पना पर पढ़ सकते हैं या पीडीएफ में डाउनलोड कर सकते हैं।

डॉ. सावित्री सिन्हा ने यह पुस्तक अपने माता-पिता (और मेरे दादा-दादी द्वारकाप्रसाद और जयदेवी) को इन शब्दों के साथ समर्पित की थी: "स्वर्गीय पिता जी की आंसूभरी, धूमिल बाल-स्मृतियों को तथा मां के असीम साहस, धैर्य, त्याग और वात्सल्य को"

मध्य युगीन कृष्ण-भक्ति ब्रज-भाषा काव्य - डॉ. सावित्री सिन्हा

 

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सूरदास से पूर्व कृष्ण-भक्ति काव्य में अभिव्यंजना-शिल्प की स्थिति - एक विहंगावलोकन

डॉ. शिवप्रसाद सिंह के शोध के फलस्वरूप अभी हाल में ही सूरदास के समय से पहले का ब्रजभाषा काव्य प्रकाश में आया है। 'सूर-पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य' नामक उनके शोध-प्रबंध में उपलब्ध साहित्य के व्यख्यान के साथ ही कुछ अनुपलब्ध साहित्य भी प्रकाश में लाया गया है और सूरदास से पहले ब्रजभाषा कवियों के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। नामदेव, कबीर और रैदास की अनुभूतिपरक रचनाओं को लेखक ने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास का एक सोपान माना है। इस निर्णय को स्वीकार करने के पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से अनेक तर्क दिये जा सकते हैं। परन्तु यह प्रश्न यहां पर अप्रासंगिक है।

संतमत के कवियों के अतिरिक्त उन्होंने कृष्ण-भक्ति काव्य के विकास में संगीतकार कवियों का महत्वपूर्ण योग स्वीकार किया है। उनके शब्दों में, “संगीतज्ञ कवियों ने न केवल अपनी स्वर-साधना से भाषा को परिष्कार और मधुर अभिव्यंजना प्रदान की, तथा अप्रतिम नाद-सौंदर्य से कविता को अधिक दीर्घयुगी बनाया परन्तु अपनी सम्पूर्ण संगीत-प्रतिभा को आराध्य कृष्ण के चरणों पर लुटा भी दिया। गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों में आत्मनिवेदन, गोपी-प्रेम और भक्ति के विविध पक्षों का बड़ा ही विशद और मार्मिक चित्रण हुआ है। गोपाल नायक के एक पद में रास का चित्रण इस प्रकार मिलता है -

कांधे कामरी गो आलाप के नाचे जमुना तीर, नाचे जमुना तीर

पीछे रे पांवरे लेती नाचि लोई मांगवा --

भुव आलि मृदंग बांसुरी बजावै गोपाल वैन वतरस ले आनन्द। (राग कल्पद्रुम)

बैजू बावरा का उल्लेख भी इस प्रसंग में किया गया है तथा राग कल्पद्रुम में संकलित उनके पदों के आधार पर उन्हें ब्रजभाषा का कवि सिद्ध किया गया है। राग कल्पद्रुम की यह रचनायें शुद्ध ब्रजभाषा में हैं -

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्सव आनन्द भयो।

हरद दूब दधि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो। (राग कल्पद्रुम)

इन दोनों ही कवियों की रचनाओं में निहित संगीत तत्व परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों की संगीत-साधना की पृष्ठभूमि से जान पड़ते हैं, परन्तु जहां तक अभिव्यंजना शैली का प्रश्न है यह रचनायें परवर्ती रचनओं के सामने पासंग भर भी नहीं ठहरतीं।

इन रचनाओं के अतिरिक्त शोधकर्ता ने निम्नलिखित ७ अप्रकाशित पुस्तकों का परिचय-परीक्षण भी प्रस्तुत किया है - अग्रवाल कवि की प्रद्युमनचरित; विष्णुदास की महाभारत कथा, स्वर्गारोहड़, रुक्मिणी मंगल, स्वर्गारोहड़ पर्व और स्नेह लीला; थेघ नाथ की गीता भाषा।

कृष्णभक्ति सम्बंधी अप्रकाशित ग्रंथों को लेखक ने जिस रूप में हमारे सामने रखा है, उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। उनके मतों को उद्धृत करके विषय-विस्तार करने से कुछ लाभ नहीं होगा। जो कुछ भी सामग्री प्रकाश में आयी है उसके अध्ययन द्वारा ये निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं -

तत्कालीन ब्रजभाषा के दो रूप थे (१) अपभ्रंश मिश्रित ब्रजभाषा (२) तद्भव प्रधान ब्रजभाषा। संस्कृति के तत्सम शब्दों के प्रयोग द्वारा तत्कालीन ब्रजभाषा का रूप परिनिष्ठित नहीं हो पाया था। प्रथम कोटि की भाषा के उदाहरण के रूप में डूंगर कवि की एक रचना उद्धृत की जा रही है -

ऋतु बसंत उलहणी विविह वणराय फलह सहू।

कंटक विकट करीर पंत पिकखंत किंपि नहु।

धाराहर वर धवल बारि वरसंत घनघोर वन।

कुरलतंउ मूल मंत्री सर्प नहीम मानहिं दुर्जन।

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औषधि मूल मंत्री सर्प नहिं मानहिं दुर्जन।

सर्प डसी वेदना एही दिट्ठइ हुई, गुंजन।

लागइ दोष अनन्त कियइ संसर्ग एनि परि।

तवडी जल हरइ घड़ी पीटियइ सुफल्लरि।

द्वितीय कोटि के उदाहरण के रूप में विष्णुदास रचित 'सनेह लीला' की ये पंक्तियां ली जा सकती हैं -

महलन मोहन करत विलास।

कहां मोहन कहां रमन रानी और कोऊ नहिं पास।

रुकमन चरन सिरावत पिय के पूजी मन की आस।

जो चाहे थी सो अब पायो हरि पति देवकी सास।

तुम बिन और कौन थो मेरौ धरति पताल आकास।

पल सुमिरन करत तिहारौ ससि पूस परगास।

इन कवियों की रचनाओं में प्रबुद्ध कला-चेतना का पूर्ण अभाव है। अभिव्यंजना-शैली की दृष्टि से ये अत्यंत साधारण कोटि की रचनायें हैं। उनकी शैली अधिकतर वर्णनात्मक और विवरणात्मक है। अप्रस्तुत योजना, लक्षित चित्र-योजना, वाग्वैदग्घय आदि तत्व बहुत ही कम हैं।

विषय-वस्तु के क्षेत्र में कुछ ऎसे तत्व अवश्य मिलते हैं जिन्हें परवर्ती कृष्ण-भक्ति काव्य का पूर्वाभास कहा जा सकता है। यह प्रभाव मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में दिखाई पड़ता है: (१) लोक संस्कृति के चित्रण में (२) शास्त्रीय संगीत के समावेश में।

गोस्वामी विष्णुदास रचित रुक्मणि मंगल की ये पंक्तियां प्रथम वर्ग के उदाहरण के रूप में ली जा सकती हैं:

मोतियन चौक पुराय के कियौ आरती माय।

अति आनन्द भयौ है नगर में घर घर मंगल साजै।

मनमोहन प्रभु ब्याह कर आये पुरी द्वारका राजै।

अंगन तन में भूषन पहिने सब मिलि करत समाज।

बाजै बाजन कानन सुनियत, नौबत घन ज्यूं बाज।

नर नारिन मिलि देत बधाई सुख उपजै दुखभाज।

नाचत गावत मृदंग बाजत रंग बसावत आज।।

दूसरे वर्ग की रचनाओं के अन्तर्गत गोपाल नायक और बैजू बावरा की रचनायें रखी जा सकती हैं। डॉ. सिंह ने इन रचनाओं को काव्य-कल्पद्रुम से संकलित किया है। संगीत कला के क्षेत्र में इस ग्रंथ का महत्वपूर्ण स्थान है परन्तु भाषा और साहित्य की दृष्टि से उसमें संकलित पदों को प्रमाणिक माना जा सकता है या नहीं यह प्रश्न विवादरहित नहीं है। यदि उन्हें प्रमाणिक मान लिया जाये तो गोपाल नायक और बैजू बावरा के पदों को परवर्ती कृष्ण-भक्त कवियों के ध्रुपद शैली में रचित पदों का पूर्वरूप माना जा सकता है। शास्त्रीय संगीत के तत्वों का उल्लेख तथा ध्रुपद शैली के अनुकूल पद-योजना इन रचनाओं में प्राप्त होती है -

सप्त स्वर तीन ग्राम इकइस मूर्छन बाइस सुर्त

उनचास कोट ताल लाग डाट

गोपाल नायक हो सब लायक आहत अनाहत शब्द,

सो ध्यायो नाद ईश्वर बसे मो घाट

तथा

मार्ग देसी कर मूर्छना गुन उपजे मति सिद्ध गुरु साध चावै।

सो पंचम मघ दर पावै।

बैजू बावरा के पदों की योजना भी ध्रपुद शैली की श्वास-साधना के निमित्त की हुई जान पड़ती है:

बोलियो न डोलियो ले आऊं हूं प्यारी को,

सुन हौ सुघर वर अब हीं पै जाऊं हूं।

मानिनि मनाय के तिहारे पाय ल्याय के,

मधुर बुलाय के तो चरण गहाऊं हूं।

सुन री सुंदर नारि काहे करत एति रार,

मदन डारत पार चलत पल तुझाऊं हूं।

मेरी सीख मान कर मान न करो तुम,

हे जु प्रभु प्यारे सो बहियां गहाऊं हूं।

बधाई के लोक-गीत भी उनके नाम से प्राप्त होते हैं:

आंगन भीर भई ब्रजपति के आज नन्द महोत्वस आनन्द भयौ।

हरद दूब दघि अक्षत रोरी ले छिरकत परस्पर गावत मंगलचार नयो।

ब्रह्मा ईस नारद सुर नर मुनि हरषित विमानन पुष्प बरस रंग ठयो।

धन धन बैजू संतन हित प्रकट नन्द जसोदा ये सुख जो दयो।

अधिकतर कवियों ने दोहा, चोपाई और छप्पय का प्रयोग किया है। कुछ पदों के ऊपर गौरी, धनाश्री और पूर्वी रागों का उल्लेख भी हुआ है।

इस सामग्री के अध्ययन के उपरान्त सूरदास से पूर्व ब्रज-भाषा काव्य के अस्तित्व की स्वीकृति में आचार्य शुक्ल का अनुमान आंशिक रूप में ही सत्य माना जा सकता है। सूरदास के काव्य-सौष्ठव पर विचार करते हुए आचार्य शुक्ल ने कहा था, ‘इन पदों के सम्बंध में सबसे पहली बात ध्यान देने की यह है कि चलती हुई ब्रजभाषा में सबसे पहली साहित्यिक रचना होने पर भी ये इतनी सुडोल और परिमार्जित है, यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यांग-पूर्ण है कि आगे होने वाले कवियों की उक्तियां सूर की जूठी सी जान पड़ती हैं। अत: सूर-सागर किसी चली आती हुई गीति काव्य परम्परा का - चाहे वह मौखिक ही रही हो - पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है।"

इन कृतियों के प्रकाश में आने पर भी कलाकार के रूप में सूर अपने पूर्व-स्थान पर ही शोभित हैं। इस काल के दर्जन कवियों में से एक भी ऎसा नहीं है जो अष्टछाप के अन्य कवियों के समकक्ष खड़ा रह सके, सूरदास तो दूर की बात है। जहां तक पूर्व-परम्परा की स्थापना का प्रश्न है यह तथ्य उसी रूप में स्वीकार किया जा सकता है जैसे हम यह कहें कि छायावादी कविता के बीज द्विवेदी-युग की रचनाओं में भी पाये जाते हैं।

सूर-पूर्व ब्रजभाषा काव्य में गीति-काव्य की मौखिक परम्परा भी स्थापित की जा सकती है, ब्रजभाषा का अस्तित्व भी माना जा सकता है पर उसमें कला-सौष्ठव का कोई ऎसा आधार नहीं मिलता जिसके कारण यह कहा जा सके कि सूरदास के पदों की प्रगल्भता और काव्यांगपूर्णता को कोई पूर्व आधार हिन्दी जगत् में विद्यमान था। कला के क्षेत्र में नये मार्गों का उद्घाटन सूरदास, नन्ददास और उनके समकालीन भक्तों ने ही किया। उनकी कला-चेतना का प्रादुर्भाव तत्कालीन परिस्थितियों के फलस्वरूप हुआ था। कला के पुनुर्त्थान युग में उनकी प्रतिभा प्रस्फुटित हो कर विकसित हुई। उत्तराधिकार रूप में उन्हें जो परम्परा प्राप्त हुई थी वह पूर्ण अविकसित थी, भाव, भाषा, शैली, किसी भी दृष्टि से मध्यकालीन कृष्ण-भक्त कवियों पर उनका ऋण नहीं स्वीकार किया जा सकता।

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का संक्षिप्त परिचय

कृष्ण-काव्य परम्परा के विकास का प्रमुख श्रेय आचार्य वल्लभ और उनके पुत्र विट्ठलदास जी को है। आचार्य वल्लभ द्वारा प्रवर्तित 'पुष्टि मार्ग' को आधार बना कर श्री विट्ठलदास द्वारा स्थापित अष्टछाप के कवियों ने हिन्दी में अमर कृष्ण-भक्ति-काव्य की रचना की। पुष्टि मार्ग की अनुभूति मूलक साधना के कारण इन कवियों ने कृष्ण के व्यक्तित्व के लीला-प्रधान अंशों को ही ग्रहण किया है। राजनीतिज्ञ कृष्ण उनके आलम्बन नहीं हैं। कृष्ण के व्यक्तित्व में उन्होंने शक्ति के साथ माधुर्य और प्रेम का समन्वय कर दिया। अलौकिक आलम्बन में सहज और मधुर मानव का आरोपण उन्होंने जिस मनोवैज्ञानिक कौशल से किया है उसमें सार्वभौम उपादानों का समावेश हुआ है।

ऎतिहासिक क्रम से अष्टछाप के कवियों का उल्लेख इस प्रकार है - कुभंनदास, सूरदास, परमानन्ददास, कृष्णदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविन्दस्वामी। सूरदास प्रधान रूप से वात्सल्य और शृंगार रस के कवि हैं, परमानन्द जी के काव्य में वात्सल्य का अनुपात महत्वपूर्ण है। अन्य कवियों की रचनाओं में श्रंगार रस का ही प्राधान्य है, उसमें वात्सल्य तो है ही नहीं या अत्यंत गौणरूप में प्रयुक्त है। इन सभी के प्रतिपाद्य में साहित्यकता, पार्थिव अनुभूतियों और आध्यात्मिकता का सुंदर सामन्जस्य मिलता है। विभिन्न कवियों के व्यक्तित्व के अनुसार तीनों तत्वों का अनुपात उनकी रचनाओं में भिन्न-भिन्न है। साहित्यिक महत्व की दृष्टि से सूरदास के बाद नन्ददास का नाम आता है। उनकी अभिव्यंजना में सचेष्ट कलाकार का शिल्प है।

पूर्वमध्यकाल के इन पुष्टिमार्गी कवियों के बाद परिमाण और गुण दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण योग राधावल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य हितहरिवंश तथा उनके शिष्यों और अनुयायियों ने दिया। राधावल्लभ सम्प्रदाय की उपासना पद्धति अन्य सम्प्रदायों से भिन्न थी। इस मत के सिद्धांतों के अनुसार राधा ही परम इष्ट हैं और कृष्ण की मान्यता इसीलिए है कि वह राधा के प्रियतम हैं। वे इष्ट नहीं हैं। भक्तजन राधा की सखी रूप में होते हैं। वे सखी रूप में उनके साथ परकीया गोपियों के समान स्वतंत्र रूप से सम्बंध स्थापित नहीं करते और न राधा के प्रति उनका सपत्नि भाव होता है। इस सम्प्रदाय में हितहरिवंश के अतिरिक्त ध्रुवदास की कला का महत्वपूर्ण स्थान है।

किसी विशिष्ठ सम्प्रदाय के बंधनों से मुक्त मतवाली मीरा और रसखान की रचनाओं का भी पूर्व-मध्यकालीन कृष्ण-भक्ति साहित्य में बड़ा महत्व है। मीराबाई द्वारा रचित कई ग्रंथों का उल्लेख प्राप्त होता है। नरसी का मायरा, गीत-गोविन्द की टीका, पद तथा गर्व गीत उनकी प्रमुख रचनायें मानी जाती हैं। उनका साहित्य और उसका स्वरूप दोनों ही संदिग्ध हैं। उनके काव्य में गिरधरगोपाल के प्रति उनकी आकुल भावनायें विर्बाध रूप से व्यक्त हुई हैं। जहां भावनायें उन्मुक्त हुईं, आकांक्षायें उच्छृंखल हो कर असंयत हो जाती हैं पर मीरा के काव्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि भावनाओं की निर्बाधता में असंयत और अनियंत्रित श्रृंगार की स्थूलताओं का समावेश नहीं होने पाया है। उनकी कला का एक अपूर्व ही सौंदर्य है जो कला सम्बंधी परिपक्वताओं से वंचित रहने पर भी पूर्ण है।

मुसलमान कृष्ण-भक्त कवि रसखान का नाम इस परम्परा में अमर है। उनके व्यक्तित्व में प्रधान प्रेम-तत्व ने लौकिक आलम्बन के अस्थायित्व के कारण अलौकिक कृष्ण का सहारा लिया और उनकी भावनायें भक्त हृदय के सुंदर उद्गारों के रूप में व्यक्त हो उठीं। भावानाओ की तीव्रता और उत्कटता के साथ ही साथ उनके काव्य का कलापक्ष भी प्रौढ़ और सबल है। 'प्रेम वाटिका' और 'सुजान रस सागर' उनके दो छोटे-छोटे ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं।

उत्तर-मध्य काल में भी कृष्ण-काव्य परम्परा विभिन्न सम्प्रदायों के संरक्षण में पल्लवित और पुष्पित होती रही। पूर्व-मध्य काल (भक्तिकाल) में कृष्ण-भक्ति-पद्धति में नैसर्गिक आलम्बन के प्रति मानवीय भावनाओं का जो उन्नयन हुआ उसमें राग और साधना का अपूर्व सामंजस्य था। इस परम्परा में रागतत्व के प्राधान्य के कारण ही १९वीं शती तक भक्ति-युग की परिष्कृत माधुर्य भावना लौकिकता में रंजित होने लगी। उत्तर-मध्य कालीन कृष्ण-काव्य परम्परा में आलम्बन और साधना दोनों पक्षों में अपार्थिव अंश केवल नाम-मात्र को ही शेष रह गया।

रीतिकालीन कृष्ण-भक्ति काव्य में श्रृंगारिक तत्वों का इतना प्राधान्य हो गया कि उसके फलस्वरूप ब्रह्मा की असीमता भी मानवीय क्रिया-कलापों में लिपट कर रह गई। साहित्य की रूढ़ परम्पराओं के अनुसार 'ब्रह्मा की प्रेमिकाओं' पर भी नायिका-भेद के विविध रूपों का आरोपण किया गया। हिन्दी काव्य जगत् में सतरहवीं शताब्दी के उपरान्त कृष्ण और गोपिकाओं के नाम पर श्रृंगारपरक ऎहिक भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रधान हो उठी।

उत्तर-मध्य काल में वल्लभ सम्प्रदाय का कोई उल्लेखनीय कवि नहीं हुआ। केवल ब्रजवासीदास ने सूरसागर के आधार पर अपने ग्रंथ 'ब्रजविलास' की रचना की। राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित वृंदावनदास ने 'लाड़ सागर' और 'ब्रज प्रेमानन्द सागर' ग्रंथों की रचना की। इसके अतिरिक्त निम्बार्क सम्प्रदाय के घनानन्द, नागरीदास, हठी जी, भगवत रसिक जी, रूप रसिक जी, सहचरिशरण ने कृष्ण-भक्ति सम्बन्धी रचनायें लिखीं, जिनमें उस युग की काव्य-चेतना की स्मस्त विशेषताओं का समावेश हो गया है।

प्रतिपाद्य के प्रति उनके दृष्टिकोण और उनकी अभिव्यंजना-कला का विवेचन आगामी अध्यायों में किया जायेगा।

आधुनिक काल नये संदेशों और नये जीवन-दर्शन से युक्त सामने आया। मध्यकालीन सामन्तीय व्यवस्था बीत चुकी थी। बौद्धिक जागरण और विज्ञान के इस युग में धार्मिकता और विशेषकर उपास्य के प्रति रागात्मक वृत्ति के उन्नयन को अंध-विश्वास और रूढ़िवादिता का नाम दिया गया। उत्तर-मध्य काल में कृष्ण-भक्ति में निहित श्रृंगार तत्व ने लौकिक श्रृंगार का रूप धारण कर लिया था, आधुनिक काल में केवल उसका अंधकार पक्ष ही अवशिष्ट रह गया। भक्ति के नाम पर भ्रष्टाचार, अंधविश्वास और पाखंड ने तत्कालीन सुधारवादी और बौद्धिक प्रवृत्तियों को अपने विरुद्ध आवाज़ उठाने की चुनौती दी। सूक्ष्म रागात्मक प्रवृत्तियों का आश्रित भक्ति बौद्धिक और ऎहिक जीवन-दर्शन के भार के नीचे दब गई। उसकी विकृति ही शेष रह गई।

मध्यकाल में भक्ति ने एक आंदोलन का रूप ग्रहण किया था। वह जनता के व्यक्तिगत और समष्टिगत संघर्षों और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने आई थी। आधुनिक काल में उसका क्षेत्र 'व्यक्ति' की सीमा में ही संकीर्ण हो गया। परिवार के संसर्ग और वैयक्तिक संस्कार इत्यादि कारणों से 'धर्म' तत्व एक संकीर्ण दायरे में ही शेष रह गया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र, जगन्नाथदास रत्नाकर, सत्यनारायण कविरत्न इत्यादि कवियों ने कृष्ण-भक्ति काव्य की रचना की जिसकी प्रेरणा स्थूल रूप में तीन प्रकार की मानी सकती है - (१) परम्परा-पालक (२) कृष्ण-चरित के गान द्वारा प्राचीन गौरव की स्थापना तथा (३) वैयक्तिक संस्कारजन्य आस्था। वल्लभाचार्य के शिष्यों द्वारा प्रवर्तित कृष्ण-काव्य परम्परा उत्थान और पतन के विविध सोपानों पर चढ़ती-गिरती आधुनिक काल तक चली आई। वल्लभ सम्प्रदाय के ही निष्ठावान भक्त भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने उनमें पुन: माधुर्य-भक्ति की परिष्कृति और सूक्ष्मता के समावेश का प्रयत्न किया, परन्तु अब इस प्रकार की भक्ति का समय बीत चुका था, देश के सामने यथार्थ नग्न मुँह बाये खड़ा था, पाश्चात्य देशों का बुद्धिवाद भारत की आध्यात्मिकता को चुनौती दे रहा था, जिसके सूक्ष्म तन्तु बाह्य स्थूलताओं के सामने हार मान चुके थे। साहित्य में व्यवहारिक भाषा के अभाव के फलस्वरूप ब्रजभाषा का स्थान खड़ी-बोली ले रही थी, ऎसी स्थिति में ब्रजनायक से सम्बद्ध काव्य-परम्परा और ब्रजभाषा दोनों के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया।

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सोमवार, दिसंबर 08, 2025

डायबिटीज़ का डर और वज़न घटाने की यात्रा

पहली बार मेरा वज़न बढ़ा जब मैं तीस-पैंतिस साल का था। करीब दस किलो बढ़ा फ़िर वहीं पर स्टेबल हो गया। उसके बाद करीब बीस-पच्चीस सालों तक मेरा वज़न एक ही जगह टिका हुआ था, और खून-पिशाब आदि के सब टैस्ट सही चल रहे थे। पाँच साल पहले जब मैं 66-67 साल का हुआ, मेरा वज़न फ़िर से बढ़ने लगा, एक साल में ही दस-बारह किलो और बढ़ गया, सब कपड़े नये लेने पड़े।

चार साल पहले ब्लड टैस्ट कराया तो उसमें सुबह का भूखे पेट वाला ब्लड शुगर बढ़ा हुआ आया। पहले यह मात्रा 90-95 मि.ग्र. से अधिक नहीं आती थी, उस बार 110 आयी।

तब सोचा कि ब्लड शुगर की बेहतर जाँच करने वाला एचबीएवन (HbA1) टैस्ट करवाना चाहिये। वह करवाया तो 6.1 आया, यानि डायबिटीज़ होने का खतरा था। नॉर्मल लोगों में यह टैस्ट 5.5 आता है। जब यह 5.6 से 6.4 तक हो तो इसे प्री-डायबिटीज़ यानि शुगर की बीमारी होने के खतरे का स्तर मानते हैं और खाने पर कन्ट्रोल करने के लिए कहते हैं।। अगर 6.5 या उससे अधिक हो तो डायबिटीज़ की दवा लेनी चाहिये।

इसलिए मैंने तब चीनी और मीठी चीज़ें खाना कम कर दीं। छह महीने बाद यह टैस्ट दोबारा कराया तो घटने के बजाय शुगर बढ़ गयी थी, यह 6.3 आया। मेरी डॉक्टर बोली कि स्थिति तेज़ी से बिगड़ रही है, मुझे दवा लेना शुरु कर देना चाहिये, लेकिन मैंने उन्हें कहा कि छह महीने और प्रतीक्षा कर लेते हैं। इसके बाद मैंने तुरंत वज़न कम करने के नये प्रयास किये।

पिछले ढाई-तीन सालों में मैने बारह किलो वज़न कम किया है और चार महीने पहले जब मैंने टैस्ट कराये तो मेरा ब्लड शुगर 91 और एचबीएवन 5.7 आये। इसके अतिरिक्त जोड़ो के दर्द तथा अन्य तकलीफों में भी राहत मिली है।

आज की इस पोस्ट में मैं अपनी वज़न और ब्लड शुगर घटाने की यात्रा की बात करना चाहता हूँ।

 

डायबिटीज़ टाईप 1 एवं 2

डायबिटीज़ की बीमारी मुख्यत: दो तरह की होती है। एक कम उम्र में होने वाली डायबीटीज़ होती है जिसमें लोगों की पैनक्रियास ग्रंथी चीनी का पाचन करने वाले हॉरमोन इन्सुलिन (insulin) को बनाना बंद कर देती है। क्योंकि उनके शरीर में यह हॉरमोन होता ही नहीं, तो उनसे चीनी नहीं पचाई जाती और खून में उसकी मात्रा बढ़ जाती है। उन्हें नियमित इन्सुलिन के इन्जैक्शन लगवाने पड़ते हैं (अभी तक गोली की तरह लेने वाली इन्सुलिन नहीं बनी है, उसके इन्जैक्शन ही लगवाने पड़ते हैं)। इसे टाईप 1 की डायबीटीज़ कहते है।

दूसरी तरह की डायबीटीज़, अधिकतर अधेड़ उम्र के बाद होती है, विषेशकर उन लोगों में जिनका वज़न बढ़ा हुआ होता है। उनके शरीर में इन्सुलिन सामान्य या अधिक बनती है लेकिन उसका शरीर पर असर रुक जाता है या कम हो जाता है, जिससे वह हॉरमोन उनके शरीर में ठीक से काम नहीं कर पाता। यह टाईप 2 की डायबीटीज़ है। दुनिया में और विषेशकर भारत में पिछले कुछ दशकों में इस तरह की डायबीटीज़ बहुत अधिक बढ़ी है। इसमें शरीर में इन्सुलिन है लेकिन वह काम नहीं करती, इसलिए वह चीनी नहीं पचा पाते और उसकी खून में मात्रा बढ़ जाती है, जिसके लिए दवा की गोलियाँ मिलती हैं।

जब खून में शुगर बढ़ जाती है तो उससे खून की रगें बंद होने का खतरा होता है जिससे हृदय, गुर्दों, आँखों, पैरों आदि में रगें बंद होने से शरीर के अंग नष्ट हो सकते हैं। इस आलेख में मैं केवल दूसरी तरह की डायबीटीज़ की बात कर रहा हूँ।

ब्लड शुगर तथा एचबीएवन टैस्टों में अंतर

रक्त में चीनी की मात्रा मापने को ब्लड शुगर टैस्ट कहते हैं। यह कई तरीकों से करते हैं, सबसे आम तरीका है सारी रात भूखा रहने के बाद सुबह-सुबह भूखे पेट के समय रक्त की चीनी को मापा जाये। यह 85-95 के आसपास होनी चाहिये। अगर यह 120 से अधिक आये तो इसका मतलब है आप को डायबीटीज़ की बीमारी हो सकती है। जब खून में चीनी की मात्रा अधिक आती है तो अक्सर उन व्यक्तियों के पिशाब में भी शुगर मिलती है।

एचबीएवन (HbA1) टैस्ट रक्त के लाल कोषों में होने वाले हिमोग्लोबिन से जुड़ी हुई चीनी को मापता है। यह टैस्ट उस समय खून में कितनी शुगर है उसे नहीं देखता, बल्कि यह देखता है कि पिछले तीन हफ्तों में  खून में चीनी का औसत स्तर कितना रहा और वह मात्रा कितनी बार बढ़ी या घटी। यानि यह टैस्ट केवल एक समय में रक्त में चीनी है को नहीं देखता, बल्कि पिछले तीन हप्तों की रक्त की चीनी किस स्तर पर रही है, उस पर निर्भर करता है। यह डायबीटीज़ का बेहतर टैस्ट माना जाता है। नॉर्मल टैस्ट 5.5 या उससे कम होता है।

मेरे शुरु के प्रयास

जब मुझे पता चला कि मेरा एचबीएवन बढ़ा कर 6.1 हो गया है तो पहले मैंने नियमित वर्ज़िश करना शुरु किया और रात को खाना खा कर एक घंटे की सैर करने लगा। खाने पर भी बहुत कंट्रोल किया, खाने की मात्रा कम की, साथ में चीनी, घी-तेल वाली चीज़ें बिल्कुल कम कर दीं। यह छह महीने किया और वह समय बहुत मुश्किल से कटा। सारा समय मेरा ध्यान खाने पर होता था और मीठी चीज़ें, बिस्कुट, चिप्स वगैरा खाने का बहुत मन करता था। इतनी मेहनत के बाद जब ब्लड टैस्ट कराया तो एचबीएवन 6.3 आया, यानि मेरी शुगर घटने के बजाय बढ़ गई थी।

तब मैंने इसके बारे में कुछ किताबें पढ़ीं। कई विशेषज्ञ इंटरमिटैंट फास्टिन्ग की सलाह दे रहे थे, यानि जितना भी खाना हो उसे दिन में छह-आठ घंटे के समय के भीतर खाईये, उस समय के बाहर कुछ नहीं खाना। मैंने भी यही रास्ता ट्राई करने का फैसला किया।

इंटरमिटैंट फास्टिन्ग या प्रतिदिन कुछ घंटों का व्रत 

इंटरमिटैंट फास्टिन्ग के विशेषज्ञ कहते हैं कि हर रोज़ कुछ घंटे का व्रत रखिये। इसके लिए वह चार सुझाव देते हैं:

1. उनका पहला सुझाव है कि रात को जब हम सोते हैं, तो हमारा सात-आठ घंटों का व्रत अपनेआप हो जाता है। वह कहते हैं कि बजाय सुबह-सुबह नाश्ता करने के, हमें उसी व्रत को कुछ घंटे और बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिये। यानि आप सुबह नाश्ता करने की जगह पर दस-ग्यारह बजे नाश्ता कीजिये। उनके अनुसार, केवल इतने व्रत से शरीर की इन्सुलिन बेहतर काम करने लगती है और ब्लड शुगर कम होने लगती है। वह कहते हैं कि अगर आप को सुबह जल्दी चाय-कॉफी की आदत है और उसके बिना नहीं रह सकते तो आप उन्हें बिना चीनी और दूध के पीजिये।

व्रत में पानी, तथा बिना चीनी और दूध की चाय-कॉफ़ी पी सकते हैं, लेकिन और किसी चीज़ का एक छोटा सा दाना भी नहीं खाना चाहिये। कुछ ज़रा सा भी खाओ, चाहे वह नींबू की दो बँदें ही क्यों न हों, हमारा शरीर सोचता है खाना आने वाला है और इन्सुलिन बनाना शुरु कर देता है, जबकि व्रत रखने का उद्देश्य है कि 14-16 घंटो तक हमारे शरीर को इन्सुलिन बिल्कुल भी न बनानी पड़े।    

2. अगर हम शुगर के साथ वज़न भी घटाना चाहते हैं तो उनका दूसरा सुझाव है कि एक समय के खाने से अन्न को बिल्कुल निकाल दीजिये या जितना हो सके कम कर दीजिये, उस समय केवल सब्जियाँ और प्रोटीन-प्रधान भोजन (जैसे कि माँस, मछली, अंडे, दाल, राजमाँ, लोभिया, साग, दूध, दही, अखरोट, बादाम, मूँगफली आदि को प्रोटीन प्रधान भोजन मानते हैं) जैसी चीज़ें खाईये। फ़ल खा सकते हैं लेकिन कम और अधिक मीठे फ़ल जैसे कि केले, किवी, संतरे आदि कम या न खायें।

3. शरीर को स्वस्थ करने के लिए हर हफ्ते कम से कम तीस या अधिक तरह की विभिन्न दालें, सब्जियाँ, फल, ड्राई फ्रूट, मसाले आदि खाईये। यानि हर रोज़ खाना बदल-बदल कर खाईये।

4. नियमित व्यायाम कीजिये जैसे कि खाने के बाद सैर करना, वर्जिश करना आदि।

मेरी प्रारम्भ की इंटरमिटैंट फास्टिन्ग

मैंने सोचा कि मैं सुबह नाश्ता करना बिल्कुल बंद कर दूँगा। केवल दोपहर में बारह बजे से शाम के साढ़े सात बजे के बीच में खाऊँगा। लेकिन बिना चाय-कॉफ़ी के सुबह मुश्किल लगती थी, सोचा कि सुबह केवल बिना चीनी और दूध की कॉफ़ी पीयूँगा।

दोपहर के खाने के लिए मैंने केवल कच्ची सब्जियाँ और फ़ल चुने। बारह बजते ही मैं गाजर, मूली, खीरा, शिमला मिर्च, टमाटर, ओलिव, बंद गोभी, शलजम, अवोकादो, सेब, आदि मिला कर मैं पूरी प्लेट भर कर के खाता था, ताकि पेट भर जाये, मुझे यह नहीं लगे कि मैं भूखा हूँ। चूँकि मेरी एचबीएवन बढ़ी हुई थी, मैंने दोपहर को अवोकादो को छोड़ कर अन्य फ़ल कम या बिल्कुल नहीं खाये।

दोपहर में तीन बजे मैं एक मुट्ठी काजू, बादाम आदि के साथ दूध वाली चाय लेता था,और शाम को सात बजे नॉर्मल पूरा खाना खाता था। इटली में वाईन हर जगह मिलती है, मैं रात के खाने के साथ आधा गिलास लाल वाईन का भी लेता था। 

साथ ही मैंने केक, मिठाई, बिस्किट, आईसक्रीम आदि बंद कर दिये, उन्हें कभी-कभार, यानि हफ्ते-दस दिन में एक बार सीमित मात्रा में खाता था।

शाम को खाने के बाद सैर तो पहले से कर रहा था, अब स्टैप्पर, वर्जिश वाले इलास्टिक आदि खरीदे और हफ्ते में चार बार, सुबह भूखे पेट व्यायाम भी करने लगा। मेरे एक मित्र जो ओर्थोपीडिक्स के सर्जन हैं, वह अपने व्यक्तिगत अनुभव से कहते हैं कि हर सुबह दस बार सूर्यनमस्कार करना सबसे अच्छा व्यायाम है, लेकिन मुझसे सूर्यनमस्कार पूरा नहीं किया जाता।

इससे मेरा वज़न घटने लगा, हर महीने में एक-डेढ़ किलो कम होने लगा। करीब सात-आठ महीनों में बारह किलो घट गया और शुगर के टैस्ट भी ठीक हो गये।

यह सब करना शुरु में बहुत मुश्किल लगा। दोपहर बारह बजे तक खाने की प्रतीक्षा करना मेरे लिए सबसे कठिन था। कभी खाने में बारह की बजाय साढ़े बारह या एक बज जाते तो मैं चिड़चिड़ा और झगड़ालू हो जाता। रात को सोते समय मुझे खाने के सपने आते थे। पहला महीना सबसे कठिन था, उसके बाद धीरे-धीरे आदत हो गयी।

और आज

एक बार खाने की आदत बदली तो मैं दोबारा अपने पुराने ढर्रे पर नहीं लौटा हूँ। आज भी मैं हर रोज़ कुछ घंटों का व्रत रखता हूँ, आम तौर पर सुबह दस बजे से रात आठ बजे के बीच में खाता हूँ, यानि चौदह घंटे का व्रत होता है। कई बार व्यस्त होता हूँ तो बारह बजे तक भी कुछ नहीं खाता, अब उसमें कुछ कठिनाई नहीं लगती।

दोपहर का खाना अब भी सब्जियों का है, लेकिन अब उनके साथ अधिक फ़ल भी खाता हूँ और साथ में दो अंडे भी। रात को नॉर्मल खाना खाता हूँ।

लेकिन खाने के इस बदलाव ने मेरी इच्छाओं को भी बदल दिया है, अब मुझे बाज़ारी खाना अच्छा नहीं लगता। लेकिन जब पार्टी हो या रैस्टोरैंट जायें तॊ मैं सब कुछ खाता हूँ। बीच में भारत गया था, तब पूरी-भाजी, छोले-भटूरे, नान-चिकन आदि खाये लेकिन उन्हें खाने में पहले जैसा आनंद नहीं आया। सत्तू की बर्फी नियमित खायी, वह मुझे अच्छी भी लगी। 

वैसे तो अब मीठा कम ही खाता हूँ लेकिन रात को अक्सर दही में शक्कर, तिल, चिया, आदि मिला कर खाना मुझे अच्छा लगता है। मैंने व्यायाम और सैर भी नहीं छोड़े।

वज़न और शुगर कम होने के साथ मुझे लगता है मेरे जोड़ों के दर्द और सामान्य स्वास्थ्य को भी इस बदलाव से फायदा हुआ है। हालाँकि वज़न कम होने के बाद मैंने खाना बढ़ा दिया है, लेकिन एक बार जो बारह किलो वज़न कम हुआ वह अभी तक नहीं लौटा है।

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शुक्रवार, नवंबर 21, 2025

नशीले पदार्थ और आध्यात्मिक सोच

यह बात 1990 के दशक के प्रारम्भ की है। मैं ब्राज़ील के उत्तर-पश्चिमी भाग में मनाउस शहर में एक मित्र से उसके यानोमामी जनजाति से जुड़े अनुभवों की बात कर रहा था। यानोमामी जनजाति के लोग अमेज़न जंगल में रहते हैं और बाहर के लोगों से बहुत कम मिलते या सम्पर्क बनाते हैं। मेरा मित्र उनके एक गुट के साथ कुछ समय तक रह कर आया था। वह बोला, "एक दिन एक झोपड़ी में उनके शमान (पारम्परिक वैद्य) और अन्य कुछ लोग बैठ कर एक नशीले पौधे की पत्तियों की चिल्लम पी रहे थे। चिल्लम के कश लगा कर, वह शमान आँखें बंद करके समाधी में चला गया। कुछ देर बाद उसने आँखें खोल कर कहा कि मेहमानों के स्वागत की तैैयारी करो, क्योंकि दूर गाँव का एक यानोमामी गुट उनके यहाँ आ रहा है।" कुछ घंटे बाद सचमुच जब दूसरे गाँव के लोग वहाँ पहुँचे तब मेरे मित्र की समझ में आया कि शमान ने नशे से मिली दूर-दृष्टि से उन्हें वहाँ आते हुए देखा था।

इसका अर्थ है कि सचमुच कुछ मादक पौधों की सहायता से हमें शरीर के बंधनों से ऊपर उठ कर विशेष शक्तियाँ मिल सकती हैं, जैसे कि दूर-दृष्टि की शक्ती? कुछ दिन पहले इस विषय पर एक वैज्ञानिक शोध के बारे में पढ़ा। 

मई 2025 की अमरीकी पत्रिका 'द न्यू योर्कर' में माईकल पोल्लान के आलेख 'हाइ प्रीइस्टस' (उच्च पुजारी) में आध्यात्मिक अनुभवों और नशीली खुम्बों (मशरूम) तथा अयाहुआस्का (Ayahuasca) जैसे कुछ अन्य नशीले पदार्थों के सम्बंधों पर शोध की बात है। शोध के लिए, कुछ पुजारियों-पादरियों-इमाम आदि व्यक्तियों को, मध्य तथा दक्षिण अमरीका के पारम्परिक वैद्यों द्वारा प्रयोग किये जाने वाले कुछ नशीले पौधों दिये गये। वह जानना चाहते थे कि क्या इन मादक पदार्थों से लोगों को आध्यात्मिक अनुभव आसान हो जाता है? उनका निष्कर्ष निकला कि हाँ, ऐसे पदार्थों के सेवन से लोगों के लिए आध्यात्मिक अनुभव आसान हो जाते हैं। विभिन्न धर्मों के व्यक्ति जिन्होंने इस शोध में हिस्सा लिया, ने कहा कि उनके अधिकाँश अनुभव अपने धर्मों की विशिष्ठ सोच वाले ईश्वर के नहीं थे, बल्कि उन्हें निरंकार, निर्गुण परमात्मा का अहसास हुआ। इस शोध में किसी हिंदू पुजारी ने भाग नहीं लिया था।

आलेख को पढ़ कर एक अन्य बात याद आयी कि 1950-60 के दशकों में पश्चिमी देशों के युवाओं में नशीले पदार्थों के सेवन का फैशन चला था। तब भारत में भाँग-चरस-गाँजे के सेवन की परम्परायें थीं इसलिए हिप्पी बन कर बहुत से पश्चिमी युवा भारत आते थे। कुछ सालों के बाद, पहले पश्चिमी देशों और फ़िर भारत ने भी, ऐसे पदार्थों के सेवन को गैरकानूनी घोषित कर दिया था। लेकिन पिछले एक-दो दशकों में ऐसे कुछ पदार्थ, जैसे कि सिलोसाइब, एलएसडी, आयाहुआस्का, आदि, के विभिन्न बीमारियों जैसे कि मानसिक रोग, कैंसर, पीड़ा आदि की दवाओं के रूप में प्रयोग तथा शोध किये जा रहे हैं।

मादक द्रव्य और आध्यात्म
 

भारतीय आध्यात्मिक सोच के विकास में मादक पेय की भूमिका?

इस बारे में सोचते हुए मेरे मन में एक अन्य प्रश्न उठा - वेदों तथा उपनिषद की आध्यात्मिक सोच दुनिया में सबसे निराली और अलग क्यों है? अन्य धर्मों में भगवान को पिता जैसे रूप में देखा गया है, जो अपने अनुयायियों से नियमित निष्ठा, अर्चना, बलिदान माँगता है और दैनिक जीवन के नियम पालन करने के लिए कहता है। जबकि हिंदू शास्त्रों में एक ओर अन्य धर्मों की तरह से मन्दिर, देवी-देवता, रीति-रिवाज़ और नियम हैं तो साथ ही, दूसरी ओर, वेद-उपानिषदों में भगवान का सर्वव्यापी, निरंकार, निर्गुण समस्त ब्रह्माँड को जोड़ती हुई चेतना वाला रूप भी है।

तब मेरे मन में ऋग्वेद के सोम रस की बात आयी। ऋग्वेद में सोम रस को बहुत महत्व दिया गया है, यह उसके नौंवे मंडल का प्रमुख विषय है, उसमें सोम रस पर 120 सूक्त और करीब ग्यारह सौ ऋचाएँ हैं। इस तरह से ऋग्वेद में सोम रस का स्थान, अग्नि और इन्द्र के बाद तीसरे नम्बर पर आता है।

ऋग्वेद में सोम रस का वर्णन एक विशेष
औषधी पौधे के रूप में किया गया है, जिसे यज्ञों में देवताओं को अर्पित किया जाता था और जिसका उपयोग स्वास्थ्य, बल और आयु बढ़ाने के लिए होता था। इसे मूसल से कुचलकर, छानकर और फिर दूध, शहद आदि के साथ मिलाकर बनाया जाता था। इसकी पहचान आज तक स्पष्ट नहीं है, लेकिन कुछ लोग इसे एफैड्रीन के पौधे जैसा मानते हैं। एफैड्रीन दवा है जो मस्तिष्क तथा तंत्रियों की क्रिया शक्ति को उकसाती और बढ़ाती है और एलोपैथी में इसका उपयोग विभिन्न रोगों के लिए किया जाता है।

मैंने सोचा कि शायद इस सोम रस के उपयोग ने ही प्राचीन भारत के ऋषियों को ऐसी अंतर्दृष्टि, ज्ञान और समझ दी जिनसे भारतीय अध्यात्म में ब्रह्म और ब्रह्मण विचारधारों का ऐसा विकास हुआ, जिसका वर्णन उपानिषदों में है।

अंत में

कहते हैं कि सही मानों में मानव सभ्यता का विकास खेती-बाड़ी के साथ हुआ था, क्योंकि जब आदि-मानव खेती करने लगा तो उसे हर रोज भूख मिटाने के उपाय खोजने की चिंता से मुक्ति मिली और कुछ अन्य सोचने-समझने का समय मिला। कुछ दिन पहले मानव विकास से सम्बंधित एक किताब में मैंने पढ़ा था कि खेती का आविष्कार मानव समूहों ने भूख मिटाने के लिए नहीं, बल्कि शराब बनाने के लिए किया था। मादक शराब का लालच था तभी आदि-मानव मेहनत से अन्न बोते थे और महीनों तक उसकी देखभाल करते थे।

क्या वैसे ही सोमरस के मादक पेय ने मानव सभ्यता को वेद-उपनिषदों के निर्गुण, निरंकार परमात्मा से मिलने का रास्ता भी दिया था? आप की क्या राय है?

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शनिवार, अक्टूबर 18, 2025

हड़प्पा की मोहरें और वैदिक संस्कृति

कुछ माह पहले मैंने अमरीका में रहने वाले भरत कुमार (यजन्देवम) के बारे में अपने अंग्रेज़ी ब्लाग में लिखा था, जिनका दावा है कि कृत्रिम बुद्धि की सहायता से उन्होंने हड़प्पा (सिंधु घाटी सभ्यता) की मोहरों की भाषा को समझा है। उनके अनुसार, उन मोहरों चिन्हों में संस्कृत में लिखी वेद-ऋचाओं का संक्षिप्त रूप हैं। उनकी यह खोज अभी तक किसी वैज्ञानिक जर्नल में नहीं छपी है और अन्य भाषाविदों ने उनके शोध से सम्बंधित बहुत से प्रश्न और संदेह उठाये हैं, इसलिए यह खोज सही साबित होगी या नहीं, यह समय ही बतायेगा।

आज मैं हड़प्पा की मोहरों के विषय में एक अन्य शोधकर्ता की बात करना चाहता हूँ, जिनका नाम है सुश्री रेखा राव। रेखा जी की धारणा है कि हड़प्पा की मोहरों पर वेदों की, विषेशकर ऋग्वेद में वर्णित देवी-देवताओ और उनसे जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों की बाते हैं। अपने व्यक्तिगत शोध के आधार पर वह कहती हैं कि यह मोहरें पुरोहितों के लिए मंत्रों, उनके पाठ तथा अनुष्ठानों को याद करने के लिए बनायी गई थीं। 

रेखा जी ऐसे परिवार से हैं जहाँ वैदिक मंत्र तथा यज्ञ जैसे अनुष्ठान उनके दैनिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। वह कहती हैं, "मैं अपने उन अनुभवों के आधार पर शोध के इस निष्कर्ष तक पहुँची हूँ।"

करीब पाँच साल पहले उन्होंने बँगलौर के एक संग्रहालय में अपने शोध की प्रस्तुती की थी जिसे आप इंटरनेट पर देख सकते हैं। उन्होंने इस विषय में कई किताबें भी लिखी हैं। मुझे उनसे बात करने का मौका मिला और मैंने उनको विचारों के बारे में जाना तो मुझे थोड़ी सी हैरानी हुई कि इसके बारे में पहले कहीं सुना क्यों नहीं था? मुझे उनकी बातें बहुत दिलचस्प और नयीं लगीं, शायद इसलिए भी कि मैंने ऐसी बात पहले कभी नहीं सुनी थी। यह आलेख उनके शोध के निष्कर्ष और उनके विचारों की बात करना चाहता हूँ। आप इस आलेख की सभी तस्वीरों पर क्लिक करके उन्हें बड़ा करके देख सकते हैं, अधिकाँश तस्वीरें उनके प्रैज़ेन्टेशन से ली गयी हैं।

सुश्री रेखा राव: संक्षिप्त परिचय

रेखा जी भारतनाट्यम नृत्य की सुविख्यात नृत्यांगना रही हैं। उन्होंने नृत्य के लिए नाट्यरत्न प्राप्त किया, तथा कर्णाटक में कोलार गोल्ड फील्ड, और जकार्ता व मुम्बई में भरतनाट्यम सिखाया भी है। आजकल वह भारतीय प्राचीन प्रतिमाओं में नृत्य-मुद्राओं के चित्रण के विषय पर शोध कर रही हैं।

उन्होंने मैसूर विश्वविद्यलय से भारतीय ज्ञान परम्परा में उच्चतर शिक्षा की डिग्री ली है। उन्होंने कुछ वर्षों तक भारत पुरातत्व सर्वे के उपाध्यक्ष डॉ. एस आर राव की छत्रछाया में शोध किया और सन् 2010 से स्वतंत्र शोधकर्ता की तरह काम कर रही हैं। उन्होंने भारतीय सास्कृतिक परम्पराओं से जुड़े विषयों पर बहुत सी किताबें और आलेख लिखे हैं जो अमेज़न पर उपलब्ध हैं।

रेखा जी ने कहा कि करीब बीस-पच्चीस साल पहले हड़प्पा की एक मोहर में उन्हें पक्षी जैसा एक चिन्ह दिखा, जिसका आकार उन्हें एक विषेश यज्ञ-वेदिका जैसा  लगा - शयन पक्षी आकार की यज्ञ-वेदिका। वह जानती थीं कि अलग-अलग वैदिक धार्मिक अनुष्ठानों में भिन्न आकारों वाली यज्ञ-वेदिकाएँ बनायी जाती हैं। वेदों तथा वेदांगों में विभिन्न आकारों की यज्ञ-वेदिकाओं में यज्ञ करने के वर्णन हैं और तैत्तरीय ब्राह्मण ग्रंथ में शयन पक्षी के आकार की वेदिका बनाने की बात की जाती है। चूँकि उन्होंने इस आकार की एक वेदिका कुछ समय पहले देखी थी, वह इसे मोहर में पहचान गयीं। जिस पहली मोहर से उनके मन में यह बात आयी, वह नीचे की तस्वीर में है।इस बात से  उनमें इन मोहरों का अध्ययन करने की इच्छा जागी। इसके बाद उन्होंने करीब दो सौ मोहरों का अध्ययन किया।  


उनके विचार इस विषय में प्रचलित अन्य सब लोगों के विचारों से भिन्न हैं, इसलिए मैंने उनसे पूछा कि इस विषय के विशेषज्ञ आप की इन धारणाओं के बारे में क्या कहते हैं तो उन्होंने बहुत सरलता से कहा कि वह कोई प्रोफैसर नहीं हैं, किसी विश्वविद्यालय या संस्था से भी नहीं जुड़ी हैं, शायद इसलिए उनकी बातों को भारतीय विशेषज्ञ गम्भीरता से नहीं लेते।

उनकी सोच उनके अपने परिवार की वैदिक संस्कृति के वातावरण और ज्ञान पर आधरित है। वह कहती हैं कि आजकल वैदिक संस्कृति की बात करने का मतलब है कि लोग आप को हिन्दुत्ववादी कहेंगे या बीजेपी की समर्थक, इसलिए आप की बातों को गम्भीरता से नहीं लिया जायेगा। वैसे भी अक्सर लोग उन्हें परम्परावादी स्त्री की तरह की तरह से देखते हैं, इसलिए उनकी बातों को गम्भीरता से नहीं लिया जाता।

मेरे विचार में, हड़प्पा के बारे में देश-विदेश के बहुत से विशेषज्ञों ने पहले से बहुत किताबें लिखी हैं और जेनेक्टिकस जैसे आधुनिक शोधों से भी इंदो-आर्य तथा हड़प्पा के मूल निवासियों के बारे में अलग तरह की समझ बनी है, इसलिए भी उनके वैदिक संस्कृति की बात करने को गम्भीरता से नहीं लिया जाता। लेकिन हमेशा से मेरी सोच रही है कि कोई भी नयी बात सुनने को मिले, मैं उसका मूल्यांकन अपनी दृष्टि और समझ से करना चाहता हूँ। मेरी आशा है कि इस आलेख को पढ़ने वाले भी उनकी बातों और विचारों को बिना पूर्वाग्रहों के पढ़ेंगे और तभी इस पर अपने विचार बनायेगे।   

यह आलेख रेखा जी की प्रैज़ेन्टेशन पर आधारित है जिसे आप यूट्यूब पर देख सकते हैं।

हड़प्पा की मोहरों का रहस्य

रेखा जी मानती हैं कि हड़प्पा की मोहरों में वैदिक अनुष्ठानों की जानकारी छिपी है।

वह कहती हैं कि वेदों में देव-पूजा का अर्थ यज्ञ करना है और हर यज्ञ में तीन बातें होती हैं - देवी-देवता, मंत्र-पाठ और आहूती। वेदों और वेदांगों में हज़ारों की संख्या में ऋचाएँ और मंत्र हैं, जिनका विभिन्न अनुष्ठानों में सही क्रम, तरीके और स्वर से उच्चारण करना आवश्यक है। उनके अनुसार, जिस काल में यह मोहरें बनीं, तब वेदों का प्रभाव पश्चिम में गांधार तक था, जहाँ नवयुवा पुरोहितों को भेजा जाता था, उस समय यह मोहरें उन युवा पुरोहितों की सहायता के लिए बनीं। मोहरें नवयुवा पुरोहितों को याद दिलाती थीं कि किस यज्ञ में, उसके उद्देश्य के अनुसार, कौन से अनुष्ठान हों जिनमें कौन से मंत्र और छंद, किस तरह से पढ़े जायें। उनके अनुसार यह सब जानकारी सिंधु घाटी सभ्यता की मोहरों में संकेतिक रूप में दिखायी गयी है। 

वह बताती हैं कि उनके शोधानुसार, सिंधु घाटी सभ्यता में तीन तरह की मोहरें मिलती हैं - (1) मोहरें जिनमें आकृतियाँ और चिन्ह दोनों हों (2) जिनमें केवल चिन्ह हों (3) जिनमें केवल देवी-देवता या मानव या अन्य आकृतियाँ हों। हर सील छोटी होती है, उनका आकार 3x3 सें.मीटर और भार 9-10 ग्रा. होता है। नीचे की तस्वीर में तीनों तरह की सील (मोहरें) दिखायी गयी हैं।


हड़प्पा की मोहरों में वेदिक देवता, पुरोहित तथा अनुष्ठान 

देवताओं की पहचान के लिए वृषभ के सींग: उन्होंने ऋग्वेद की ऋचाओं के कई उदाहरण दिये जिनमें इन्द्र और अग्नि की तुलना वृषभ यानि बैल से की गयी है। इसलिए वह कहती हैं कि मोहरों पर देवताओं के सिर पर या सिर के पास बैल के सींग बनाये गये, जिनसे हम देवताओ को पहचान सकते हैं। उदाहरण के लिए नीचे वाली तस्वीर में ध्यान-मुद्रा में बैठी मानव-आकृति के सिर के ऊपर बने सींगों को लाल परिधि में दिखाया गया है।

पुरोहितों को एक सींग वाले वृषभ के रूप में दिखाना: उनका दूसरा प्रस्ताव है कि मोहरों पर होत्र-पुरोहितों (यज्ञ करने वाले पुरोहित) को एक सींग वाला बैल दिखाया गया। वह कहती हैं कि आज भी यज्ञ करने वाले पुरोहितों को अपने नाखूनों से पीठ खुजाने की मनाही होती है और बहुत से यज्ञ कई दिन या लम्बे समय के लिए भी चलते हैं। इस समय में अग्नि के पास बैठे परोहितों को पीठ खुजाने के लिए, उन्हें काले मृग के एक सींग, जिसे कंडुयानी कहते हैं, दिया जाता है। कंडुयानी को उनकी पीठ के वस्त्र के ऊपरी भाग में लगा दिया जाता है। चूँकि वृषभ यानि अग्नि देवता, स्वयं सभी देवताओ के पुरोहित हैं, इसलिए हड़प्पा की मोहरों में एक सींग वाले वृषभ को पुरोहित का प्रतीक बना कर दिखाया गया है।


इसके अतिरिक्त मोहरों में इन एक-सींग वाले वृषभों की पीठ पर एक, दो या तीन तार वाला जनेऊ बना दिखता है, यह भी उनके पुरोहित का चिन्ह होने का प्रमाण है। जैसे के ऊपर वाली मोहरों में वृषभों की पीठ पर दो तार वाले जनेऊ दिखते हैं। 

इन मोहरों में एकसिंगा वृषभ के सिर की मुद्रा से मंत्र पढ़ने वाले पुरोहितों को अन्य जानकारियाँ दी जाती थीं - उसका सिर अगर ऊपर की दिशा में है तो उन मंत्रों को उदात्त यानि ऊँचे स्वर में पाठ करते हैं, अगर सिर निचली दिशा में है तो मंत्रों का अनुदात्त यानि नीचे स्वर में पाठ करते हैं और अगर सिर सीधा है (यानि स्वरिता हो) तो उन मंत्रों और छंदों का समान्य स्वर में पाठ करते हैं (नीचे की तस्वीर में तीनों तरह की मुद्राएँ दिखायी गयी हैं)।


वृषभ के सिर के नीचे चारा-स्तम्भ जैसी आकृति: जितनी भी एकसिंगा वृषभ वाली मोहरें हैं, उनमें बैल के सिर के नीचे एक स्तम्भ पर कुछ बना हुआ लगता है, जैसे कि वृषभ के चारा रखा हो। लेकिन अपने शोध से रेखा जी ने देखा कि वृषभ के सामने रखे स्तंभों की यह आकृतियाँ आपस में बहुत भिन्न बनी हैं, यह ऊपर से ढकी हुई हैं और किसी मोहर में वृषभ को इसमें खाता हुआ नहीं दिखाया गया है। इसलिए उनका निष्कर्ष है कि यह चारा-स्तम्भ नहीं हैं, बल्कि यह आकृतियाँ ऋग्वेद के विभिन्न भागों और उनके छंदों के बारे में बताती हैं ताकि यज्ञ करने वाले पुरोहित को पता रहे कि उस यज्ञ में वेद के किस भाग और छन्द का पाठ करना है। नीचे तस्वीर में इन स्तम्भों की आकृतियों के कुछ नमूने हैं, जिन्हें वह भिन्न छंदों से जोड़ती हैं।

मोहरों पर बने चिन्ह: उनका कहना है कि मोहरों के चिन्ह, आकृतियाँ आदि सब मिला कर देखने चाहिये, केवल चिन्हों के अर्थ अलग से खोजना सही नहीं है। उनके अनुसार मोहरों के चिन्हों से यज्ञ और अनुष्ठान के बारे में अन्य जानकारी दी जाती है जैसे कि कौन सा यज्ञ, कैसी वेदिका, किस कड़छी से आहुती दी जाये, आदि।

दो प्रश्न

रेखा जी की इन बातों से मेरे मन में दो प्रश्न उठे जो मैंने उनसे पूछे:

पहला प्रश्न: अगर मोहरों का काम पुरोहितों को जानकारी देना है कि यज्ञ कैसे किया जाये, कौन से छंद और मंत्र कैसे पढ़े जायें, आदि तो उन्होंने यह केवल छोटी-छोटी मोहरों से क्यों किया, जिन्हें देखना उतना आसान नहीं है? उन्होंने कुछ बड़ी मोहरें क्यों नहीं बनायीं?

रेखा राव: जिस समय हड़प्पा की संस्कृति बन रही थी, वैदिक संस्कृति भारत के पश्चिम में गंधार तक फैली थी। नये क्षेत्रों में जाने वाले कम अनुभवी युवा पुरोहितों के लिए आवश्यक था कि वे हज़ारों मंत्रों और अनुष्ठानों को सही विधियों से याद रखें और करवायें। यह मोहरें वे अपने साथ ले कर जाते थे। तब यात्रा करना आसान नहीं था, उनके लिए छोटी मोहरों को सामान में ले जाना अधिक आसान था। 

मेरी टिप्पणी:  कुछ ऐसी मोहरें भी मिली हैं जिनके पीछे छेद बने हैं, शायद ऐसी मोहरों को रस्सी या धागे में पिरो कर यात्रा में ले जाना सुविधाजनक होता होगा, जैसे इस अगली तस्वीर में देख सकते हैं।


दूसरा प्रश्न: अपनी प्रेज़ेनटेशन में एक जगह पर नीचे सिर किये हुए एकसिंगा वृषभ और उसके नीचे छोटे से स्तम्भाकार आकृति के बारे में आप कहतीं हैं कि यह जिन छंदों के पाठ की मोहर है उन्हें बहुत धीमे अनुदात्त स्वर में पढ़ा जाता है, जैसा कि यजुर्वेद में कहा गया है। इस बात से मेरे मन में प्रश्न उठा कि यजुर्वेद तो बहुत बाद में लिखा गया था, तब उन्होंने इसकी मोहर हड़प्पा काल में कैसे बनाई?

रेखा राव: मंत्र और ऋचाएँ तो ऋग्वेद की ही थीं, यजुर्वेद में उन रीति-रिवाज़ों की सही विधियाँ बाद में लिखी गयीं, लेकिन यह विधियाँ प्राचीन थीं। ग्रंथ जब भी लिखे गये हैं, उनके अनुभव उस समय से बहुत पुराने थे। मंत्र पढ़ते समय कुछ शब्द सपाट स्वर में बोले जाते हैं, अन्य शब्दों में आवाज़ को ऊपर ले जाते हैं, कुछ अन्य मंत्र ऐसे होते हैं जिन्हें इतना धीमे बोलते हैं कि पास में खड़ा व्यक्ति भी नहीं सुन पाता। यह सब बातें कि कब, कहाँ पर कौन सा मंत्र और छंद कैसे बोलना है, यह ज्ञान मोहरों में अंकित है। 

कुछ दिलचस्प मोहरें

रेखा जी की प्रेज़ेन्टेशन में कुछ मोहरें मुझे बहुत दिलचस्प लगीं। इस बारे में मैं उनके प्रैज़ेन्टेशन से कुछ स्लाइड दिखाना चाहता हूँ।

(1)  वज्रबाहू इन्द्र की मोहर: वह बताती हैं कि ऋग्वेद में इंद्र को वज्रबाहू कहा गया है, वह बारिश रोकने वाले असुर से लड़ते हैं और बारिश करवाते हैं। इस मोहर को देखें तो स्पष्ट दिखता है मानो उनकी बाहों से वज्र निकल रहे हों, इसलिए उनका इस मोहर का वज्रबाहू नाम देना सही लगता है।


(2) प्रजापति मोहर: मैंने इस मोहर को दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में देखा था, वहाँ इसे योगमुद्रा में बैठे  शिव का पशुपति रूप कहा गया है। जबकि रेखा जी का कहना है कि यह पशुपति मोहर नहीं है, बल्कि यह स्वर्णकंगन पहने प्रजापति हरण्यबाहू की मोहर है, क्योंकि इसमें विभिन्न जँगली पशुओं को दिखाया गया है। उनके अनुसार ऋग्वेद में पशुपति को पालतू पशुओं का स्वामी कहा गया है, वह दैविक चिकित्सक हैं जो मनुष्यों और पालतु गाय, भैंस जैसे पशुओं की रक्षा करते हैं। जबकि इस मोहर में पालतू पशु नहीं बल्कि जँगली पशु दिखाये गये हैं। इसलिए वह कहती हैं कि इसे पशुपति नहीं प्रजापति की मोहर कहना चाहिये।


 (3) अग्न्याधेया यज्ञ के अग्नि कुंड: उनके अनुसार इस विषेश यज्ञ में जिस तरह से भिन्न अग्नि कुँड बनाये जाते हैं, वैसे ही कुँड हड़प्पा की मोहरों में भी दिखते हैं। नीचे की तस्वीर में आप अग्न्याधेया यज्ञ के आजकल बनने वाले कुँड और हड़प्पा की मोहरों में उनका चित्रण, दोनों देख सकते हैं।


(4) प्रावर्ग्या यग्न: रेखा जी कहती हैं कि इस यग्न में सप्तहोत्री यानि सात पुरोहितों द्वारा अग्नि का आवाह्न किया जाता है जिसमें बहुत गर्म घी को दूध में मिलने से अग्नि विस्फोट जैसा हो कर अग्निस्तम्भ बनता है, जिसकी उन्होंने केरल प्रदेश से पंजल नाम की जगह की तस्वीर दिखायी। वह मानती हैं कि नीचे वाली हड़प्पा की मोहर में इसी यज्ञ को दिखाया गया है। इसमें अध्वर्यू यानि अग्नि देवता पूजा कर रहे हैं, नीचे सप्तहोत्री खड़े हैं, बायीं ओर खारा नाम की गोल वेदी पर रखे महावीर कुम्भ में बृहस्पति बने हैं जोकि यज्ञ में अग्नि-स्तम्भ रूप में प्रकट होते हैं। आप सभी तस्वीरों पर पर क्लिक करके बड़ा करके देख सकते हैं।

(5) श्राध की मोहरें: रेखा जी कहती हैं कि जब पितृों का श्राध करते हैं तो उसमें तीन पुजारी तीन भिन्न दिशाओं से आते हैं और भिन्न दिशाओं में ही रीति अनुसार यजमान की तीन पीढ़ियों के श्राध के लिए मंत्रों का पाठ करते हैं। इसलिए वह कहती हैं कि जिन मोहरों पर तीन अलग दिशाओं की ओर मुँह किये हुए तीन वृषभ बने हैं, यह श्राध की रीति और मंत्र समझाने वाली मोहरें हैं। 


अंत में

मुझे सुश्री रेखा राव की हड़प्पा की मोहरों की बातें कि यह वैदिक मंत्रों, छंदों और अनुष्ठानों को अंकित करती हैं, बहुत दिलचस्प और नयी लगीं। शायद अगर मोहरों के चिन्हों के अर्थ समझ में आ जायें तो उनकी बातों के प्रमाण भी मिल जायें, वरना उनके प्रस्ताव रोचक लग सकते हैं, लेकिन शायद उनके प्रमाण मिलना कठिन है।

उनकी बातों में अपना तर्क है लेकिन यह सब बातें आज के जाने-माने विशेषज्ञों से इतनी भिन्न हैं कि मेरे विचार में इन्हें स्वीकार किया जाना कठिन लगता है। जेनेटिक्स और अन्य प्रमाणों से इंदो-आर्य के आने की जो बातें की जाती है, उनमें और हड़प्पा की मोहरों के इस तरह के अर्थ के बीच में सामंजस्य नहीं बिठा सकते। नीचे की तस्वीर में रेखा जी की कुछ पुस्तकें जो अमेज़न पर उपलब्ध हैं।


जहाँ तक मैंने पढ़ा है, सारी बहसें मोहरों पर बने चिन्हों को भाषा मान कर उनके अर्थ समझने के बारे में हैं, उनके तीनों भागों को मिला कर, उनके आंतरिक अंतर-सम्बंधों को जोड़ कर नहीं देखा गया है। जबकि रेखा जी की बातों में तर्क है और उनकी बातों से स्पष्ट है कि उन्हें वेदिक अनुष्ठानों की बहुत अच्छी जानकारी है, इसलिए वह उन पहलुओं को देख-समझ सकती हैं जिन्हें अन्य विशेषज्ञ नहीं देख पाते। 

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मंगलवार, अक्टूबर 14, 2025

यात्रा की तैयारी

मेरी दिल्ली जाने की तैयारी शुरु हो गयी है। अगले सप्ताह भारत पहुँच रहा हूँ। तैयारी करते हुए सोच रहा था कि पहले की यात्राओं और अब की यात्राओं में कितना कुछ बदल गया है।

लाने-ले जाने वाली बदलती दुनिया 

एक ज़माना था जब भारत जाने से पहले लम्बी लिस्टें बनाता था कि कौन से मसाले, कौन सी दालें, कौन से गानों के कैसेट, कौन सी फिल्मों के वीडियो कैसेट, वगैरा लाना भूलना नहीं है। उन लिस्टों में और भी न जाने क्या क्या होता था। तब सबसे बड़ी चिन्ता होती थी कि सूटकेस का वज़न अधिक हो गया तो सामान एयरपोर्ट पर न छोड़ना पड़े।

फ़िर समय बीता, सन् दो हज़ार के आसपास कैसेट के बदले में सी.डी. या डी.वी.डी. आ गयीं। तभी यहाँ इटली में भी प्रवासी आने लगे तो यहाँ भी एशिआई दुकाने खुलने लगीं। इसलिए पहले दालों और मसालों को लाना कम हुआ फ़िर बिल्कुल समाप्त हो गया। फ़िर हर तरह के फ़ल-सब्जियाँ भी यहाँ मिलने लगे। 

जैसे-जैसे समय बीत रहा है, अधिक चीज़े यहाँ मिलने लगी हैं और उनकी क्वालिटी बेहतर हो रही है। एक उदाहरण आमों का। वैसे तो सुपरमार्किट में ब्राज़ीली या अफ्रीकी आम भी मिलते हैं, लेकिन पिछले दस-पंद्रह सालों से पाकिस्तानी आम भी आने लगे थे, जो स्वाद में अच्छे थे लेकिन बहुत मँहगे होते थे, सात-आठ यूरो का एक किलो। इस साल यहाँ स्पेन से एक बहुत बढ़िया आम मिल रहा है, ढाई यूरो का एक किलो। हर साल इस तरह से कुछ न कुछ अन्य चीज़ें बिकने लगी हैं, जैसे कि हल्दीराम के गोलगप्पे के डिब्बे। 

हमारे छोटे से शहर में भारतीय दो ही हैं लेकिन यहाँ बँगलादेश और पाकिस्तान के बहुत से प्रवासी हैं, इसलिए यहाँ उनकी दुकाने भी खुली हैं और हर तरह का सामान भी मिलने लगा है। पहले जाने से, दो पहीने पहले से सपने आने लगते थे कि आम खाने हैं, मिठाई खानी है, मेथी, भिंडी और करेले की सब्ज़ी खानी है, इन दुकानों की वजह से अब वह सब बहुत कम हो गया है।

एक ओर लाने वाले सामान में कमी हुई है तो दूसरी ओर भारत ले जाने वाले सामान में बड़ा बदलाव आया है। 

सबसे बड़ी दिक्कत है कि घर के लोगों के लिए क्या गिफ्ट ले कर जाओ?  वहाँ पर अब सब कुछ मिलने लगा है। पहले चॉकलेट, व्हिस्की जैसी गिफ्ट ले कर जाता था, अब बहुत सोचना पड़ता कि किसके लिए क्या ले कर जाऊँ, अधिकाँश के लिए कुछ नहीं ले कर जाता। कई बार कपड़े ले कर गया हूँ लेकिन अक्सर उन पर भी "मेड इन इंडिया", या बंगलादेश या चीन या वियतनाम का नाम लिखा होता है, इसलिए लगता है कि उन्हें ले कर जाना बेकार है। 

वहाँ हिन्दुस्तान की शहर-सड़कें इतनी तेज़ी से बदल रहीं हैं कि मन में थोड़ा सा यह डर भी होता कि वहाँ जाऊँगा तो सब कुछ बदला-बदला दिखेगा। पहले प्लैन बनते थे कि इस दोस्त से मिलना है, वहाँ रिश्तेदार के यहाँ जाना है, वगैरा। वह भी अब बहुत कम हो गया है क्योंकि व्हाटसएप्प और फेसबुक से सबकी खबर मिलती रहती है, कभी कभी वीडियो कॉल से बात भी हो जाती है, तो लगता नहीं कि उनसे बहुत दिनों से नहीं मिले, अब मिलना चाहिये।

लेकिन अभी भी कुछ चीज़ें हैं 

इटली में हमारे शहर में अभी दोसा, पूरी-भाजी और छोले-भटूरे जैसी चीज़ें नहीं मिलती, इसलिए सोचता हूँ कि उन्हें खाना है। आयुर्वेदिक दवाएँ खरीद कर लानी हैं। सिनेमा हॉल में जा कर नयी फ़िल्में देखने का आकर्षण भी है। वैसे तो यहाँ सब फ़िल्में देखने को मिल जाती हैं लेकिन हिन्दुस्तान में सिनेमा हॉल में कोई हिट फ़िल्म देखने का मज़ा कुछ और है, बस एक बात अच्छी नहीं लगती कि लोग अक्सर वहाँ भी मोबाइलों पर लगे दिखते हैं।

मुझे संग्रहालय जाने, चिड़ियाघर जाने, बाज़ार में घूमने, संगीत और नृत्य के कार्यक्रम देखने आदि भी बहुत अच्छे लगते हैं, इसलिए इसकी लिस्ट भी बनती है कि कौन सी जगहों पर जाना है। पिछली बार गया था तो इंडिया गेट के पास नये सैनिक स्मारक को और मैहरोली पुरात्तव पार्क को देखने गया था। इस बार के.एम. कला संग्रहालय और दिल्ली आर्ट गैलरी की नयी प्रदर्शनी को देखना है। करीब दो-तीन दशकों के बाद इस बार मैडिकल कॉलेज के कुछ पुराने साथियों से मिलने की योजना भी है। चूँकि घुटनों में दर्द रहता है, लम्बी यात्रा करने का कोई कार्यक्रम नहीं बनाया।

लेकिन हिन्दुस्तान जाने में घरवालों से मिलने की चाह अभी भी सबसे प्रबल होती है, सबके साथ बैठना, बतियाना, गप्प मारना, वहाँ जाने का सबसे बड़ा सुख और आकर्षण यही लगता है। अमरीका से मेरी दूसरी बहन भी वहाँ आयेगी, तब भाई-बहन साथ में बैठ कर खूब गप्प मारेंगे, अतीत की बातों और जो लोग नहीं रहे उन्हें याद करेंगे, कुछ बहसें और लड़ाईयाँ भी होंगी। घर लौटने का सबसे बड़ा सुख यही होगा। नीचे वाली तस्वीर पिछली यात्रा से है।


 

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रविवार, सितंबर 14, 2025

शब्दों की हिंसा

कुछ दिन पहले भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने टीवी के प्रोग्राम वाले श्री समय रैना और अन्य विदूषकों को आदेश दिया कि वे अपने कार्यक्रम में विकलांग और बीमार व्यक्तियों की खिल्ली उड़ाने के लिए उनसे क्षमा माँगें।

हर भाषा में कमज़ोर, अल्पसंख्यक, नीचे देखे-माने जाने वाले समुदायों के व्यक्तियों के लिए ऐसे शब्द होते हैं जिनसे उनकी कमज़ोर तथा अवाँछनीय सामाजिक स्थिति पर ज़ोर दिया जाता है। वैश्या, अँधा, बहरा, लूला, अछूत, गँवार, पागल जैसे शब्द इनके कुछ उदाहरण हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद १९४८ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सार्वभौमिक मानव अधिकारों के घोषणापत्र को अपनाया। उसके बाद से विभिन्न वंचित समुदायों ने शब्दों की हिंसा के बारे में बात करनी शुरु की और कहा कि उनके लिए नये शब्द होने चाहिए जिनसे उनकी मानव अस्मिता को स्वीकारा जाये और उनकी छवि सकारात्मक बने।

लेकिन यह संघर्ष बहुत पहले से चल रहे थे। जैसे कि गाँधीजी ने "हरिजन" शब्द का प्रयोग १९३२ में किया था क्योंकि वह सोचते थे कि अछूत की जगह हरिजन कहने से अस्पृश्यता निवारण में मदद मिलेगी।

लेकिन केवल भाषा बदलने से व्यक्तियों की स्थिति नहीं सुधरती और कई बार, समय के साथ नये शब्द भी नकारात्मक बन जाते हैं। जैसे कि समय के साथ 'हरिजन' शब्द के बदले 'दलित' शब्द का उपयोग बेहतर माना गया, जबकि आजकल कुछ लोग भीमटा या भीमवादी शब्द का प्रयोग भी करते हैं।

इस तरह के समय के साथ नये शब्दों के नकारात्मक बदलाव एक अन्य उदाहरण है मन्दबुद्धि बच्चों के लिए अंग्रेज़ी में पहले 'इम्बेसाईल' (नासमझ) शब्द का प्रयोग होता था, उसे बदल कर 'ईडियट' (बेवकूफ) किया गया, फ़िर जब ईडियट शब्द को बुरा माना गया तो 'लो इटेलिजैंस' (मन्द बुद्धि), 'इटेलेक्चुअल डिसएबिल्टी' (मानसिक विकलाँता) जैसे शब्द खोजे गये। आजकल इन सभी शब्दों का प्रयोग न करने के लिए कहते हैं और उनकी जगह पर 'लर्निन्ग डिसएबिल्टी' (सीखने की विकलाँगता)  शब्द का प्रयोग करने के लिए कहते हैं। (नीचे की छवि इसी विषय पर हुई मंगोलिया में एक मीटिन्ग से है)

विकलाँगता के सही शब्द कौन से हों, मंगोलिया की मिटिन्ग - छवि डॉ. सुनील दीपक की

  

शब्दों के बदलाव में जिस समुदाय की बात हो रही हो, उसके लोग स्वयं अपने लिए शब्द चुनना पसंद करते हैं। जैसे कि कुछ वर्ष पहले भारत सरकार ने 'विकलाँग' के बदले 'दिव्याँग' शब्द का प्रयोग रखा, लेकिन बहुत से विकलाँग व्यक्तियों ने इस नये शब्द का विरोध किया है।

शब्दों से जुड़ी हिंसा की बहसें सबसे अधिक अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, विषेशकर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर होती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय घोषणापत्रों और समझौतों में कौन से शब्दों का प्रयोग होना चाहिये। कई बार मुझे लगता है कि सालों तक इन बहसों में लड़ने-झगड़ने वाले लोगों को अपने आप को बड़ा एक्टिविस्ट दिखाने और बढ़-चढ़ कर बोलने में अधिक दिलचस्पी होती है, जबकि उनके देशों में गाँवों-शहरों में रहने वाले लोगों को इस सबसे कुछ फायदा नहीं होता क्योंकि इन बहसों का उनकी अपनी भाषाओ में कुछ सार्थिकता नहीं होती।

जैसे कि विकलांगों के सम्बंध में मैंने सालों तक 'डिसएब्लड पर्सन' (विकलाँग व्यक्ति) और 'पर्सन विद डिसएबिलिटी' (व्यक्ति जो विकलाँग है) में से कौन सा शब्द बेहतर है इस पर हज़ारों अंतर्राष्ट्रीय बहसें देखी हैं। अंत में यह फैसला हुआ कि 'पर्सन विद डिसएबिल्टी' का प्रयोग होना चाहिेये क्योंकि इसमें पर्सन (व्यक्ति) शब्द पहले आता है, जिससे उसकी विकलाँगता को नहीं बल्कि उसके व्यक्ति होने को अधिक महत्व देते हैं। आज अगर आप किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में गलती से 'डिसएब्लड पर्सन' बोल दें तो कुछ लोग बहुत क्रोधित हो जाते हैं, आप को निकालने की धमकियाँ देते हैं।

मैं सोचता हूँ कि इस सारी बहस का हमारे देशों में रहने वाले लाखों विकलाँग व्यक्तियों पर क्या असर पड़ता है? कितने हिंदी बोलने वाले, 'विकलाँग व्यक्ति' के बदले में 'व्यक्ति जो विकलाँग हैं' बोलना चाहेंगे?

मेरे विचार में भाषाओं में हिंसा होती है, क्योंकि समाजों में हिँसा होती है और भाषाएँ समाजों के प्रतिबिम्ब होती हैं। समाज की हिंसा से लड़े बिना, भाषा की हिंसा से लड़ने का क्या फायदा है?

मेरे विचार में व्यक्तियों को नीचा दिखाने वाले शब्दों को बदलने का पहला कदम उन व्यक्तियों की आत्मचेतना है जिससे उन्हें अपनी स्थिति की समझ आये, वह स्वयं उस शब्द को अस्वीकार करें। यह पहला कदम आसान नहीं है क्योंकि हम जिन समाजों में पलते और बड़े होते हैं, वह बचपन से हमारी सोच को प्रभावित करता है। बचपन से अपने लिए सुनी नकारत्मक बातें हमारे भीतर घर बना कर रहती हैं, हम खुद अपने आप को नीचा, कमज़ोर, मानने लगते हैं। 

इसका दूसरा कदम है कि अपने लिए नया शब्द चुनना और उसके लिए लड़ना, लेकिन वह केवल शब्द बदलने की लड़ाई नहीं होती। उसके साथ एक दूसरी बड़ी लड़ाई भी होती है जिसमें वह अपनी सामाजिक स्थिति के बदलाव तथा उत्थान के लिए भी लड़ते हैं। 

अगर आप किसी ऐसे समुदाय से हैं जिनके लिए नकारात्मक शब्दों का प्रयोग होता है, तो आप इस बारे में अपनी राय टिप्पणी के माध्यम से अवश्य दें कि आप  इस विषय में क्या सोचते हैं और आप का व्यक्तिगत अनुभव क्या बताता है? 

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बुधवार, जुलाई 02, 2025

यौन दुराचरण और हमारी चुप्पियाँ

पिछले कुछ दिनों में फेसबुक पर साहित्यकारों से जुड़ी यौन दुराचरण की एक बहस चल रही है। मैं फेसबुक पर कम ही जाता हूँ और कोशिश करता हूँ कि नकारात्मक बातें न पढ़ू, फ़िर भी इस बहस के कुछ हिस्सों पर मेरी नज़र पड़ी। उस बहस में जिन व्यक्तियों की और जिस घटना की बात हो रही है, मैं दोनों से अपरिचित हूँ, इसलिए उसके बारे में कुछ नहीं लिखना चाहता।

लेकिन इस बात से मुझे अपने कार्य-जीवन से जुड़ीं यौन दुराचरण की बातें याद आ गईं। यह आलेख मेरी उन यादों, अनुभवों, तथा विचारों के बारे में है।


आप क्या करेंगे?  

अगर आप को पता चले कि आप का मित्र या ऐसा व्यक्ति जिसे आप बहुत मानते हैं वह यौन-दुराचरण कर रहा है तो आप क्या करेंगे? यह बातें फ़िल्मों में देख कर या दैनिक या पत्रिका में पढ़ कर आसान लगती है, और हम सोचते हैं कि इसके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए। 

जैसे कि मीरा नायर की फ़िल्म "मॉनसून वेडिन्ग" में यह प्रश्न उठता है, जब पता चलता है कि परिवार का एक सम्मानित आदमी जिसने परिवार की कई अवसरों पर मदद की है, घर की बच्ची के साथ जबरदस्ती यौन सम्बंध करता था। उस फ़िल्म में परिवार के वरिष्ठ लोग उस आदमी को वहाँ से चले जाने के लिए कहते हैं। लेकिन फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में क्या होता है? वहाँ अक्सर इस विषय पर चुप्पियाँ मिलती हैं, और लोग इस बारे में बात करने में असहज हो जाते हैं।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव भी यही बताते है कि सामान्य जीवन में इस तरह के निर्णय लेना कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। अगर आप को यौन विषय पर पढ़ने-सुनने से परेशानी होती है, तो मेरी सलाह है कि आप इस आलेख को आगे नहीं पढ़िये।

दो जाने-माने नाम

एब्बे पिएर फ्राँस में १९१२ में पैदा हुए थे और उनकी मृत्यु सन् २००७ में हुई थी। उन्हें लोग संत मानते-बुलाते थे। सन् १९४९ में एब्बे पिएर ने यूरोप में एम्माउस नाम की संस्था बनाई थी जो गरीबों, विकलांगों, कुष्ठ रोगियों, शरणार्थियों आदि के साथ सक्रिय थीं। उनकी संस्था से प्रभावित हो कर बहुत सी अन्य एम्माउस एसोसियेशन भी बनीं। चूँकि मैं भी कुष्ठ रोग और विकलांगता के क्षेत्र में सक्रिय था, उनमें से कई संस्थाओं के साथ मेरे सम्पर्क बने और उनके साथ बहुत बार काम भी किया।

करीब तीस-पैंतीस साल पहले, नब्बे के दशक में मैं एब्बे पिएर से एक बार मिला था और उनकी बातों और सोच से बहुत प्रभावित हुआ था। इसलिए जब पिछले वर्ष (२०२४ में), एब्बे पिएर के बारे में खबरें आईं कि उन्होंने बहुत सी बच्चियों के साथ यौन दुराचार किया था, तो मुझे बहुत धक्का लगा था। इस विषय पर एक नई किताब आई है जिसकी लेखिकाओं ने इस विषय पर छानबीन की है जिससे स्पष्ट होता है कि उनके यौन दुराचार की बातें लोगों को बहुत पहले से मालूम थीं लेकिन इसके बारे में कोई खुल कर नहीं बोलता था। ३३ स्त्रियों ने बचपन में उनके इस तरह के व्यवहार के व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में गवाही दी है।

जब इस तरह की बातें पता चलती हैं तो पहला प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है - उस व्यक्ति के अच्छे कामों के बारे में क्या किया जाये? उन्हें भुला दिया जाना चाहिये? किसी व्यक्ति की बात करते हुए  उसके अच्छे और बुरे कर्मों को किस तराजू में कैसे तोला जाये?

दूसरी बात है समय की। एब्बे पिएर को गुज़रे हुए सतरह साल हो चुके हैं तो अब यह बातें कहने का क्या लाभ है? मेरे विचार में सच्ची बात को अभिव्यक्त करना भी आवश्यक है। इस समाचार के बाद कुछ एम्माउस संस्थाओं ने अपनी वेबसाईट आदि से एब्बे पिएर का नाम हटा दिया है। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि इतने सालों के बाद की उन औरतों की स्मृति पर भरोसा नहीं किया जा सकता, या फ़िर किसी को मानसिक रोग हो तो वह गलत सम्बंध की बात की कल्पना भी कर सकता है, इसलिए इन बातों पर पूरा विश्वास करना कठिन है। लेकिन मुझे लगता है कि इतनी सारी औरतों की शिकायतों को मानसिक रोग कहना सच्चाई से मुँह छुपाना है।

दूसरी बात डेविड वर्नर की है। पिछड़े और विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बहुत सारे लोग डेविड वर्नर की दो किताबों को जानते हैं, "जहाँ कोई डॉक्टर नहीं है" और "गाँव के विकलांग बच्चे"। १९८०-९० के समय में यह दोनों किताबें बहुत प्रसिद्ध थीं और इनसे प्रेरणा पा कर इस तरह की अन्य कई किताबें भी लिखी गईं जैसे कि "जहाँ कोई डैंटिस्ट नहीं है", "जहाँ कोई मनोरोग विषेशज्ञ नहीं है", आदि।

मैंं डेविड से पहली बार १९८८ में मिला था और विकलांगता से सम्बंधित विषयों पर उसकी सोच-समझ को प्रेरणादायक पाया था।

२००३-४ के आसपास मैंने सुना कि उस पर आरोप लगा है कि मैक्सिको के जिस गाँव में रहता और काम करता था, वहाँ के कई बच्चों के साथ उसके यौन सम्बंध भी थे। मुझे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन मेरी एक अंग्रेज़ी मित्र ने मुझे उसकी एक चिट्ठी दिखायी जिसमें वह इस तरह के "प्रेम सम्बंधों" को वह बच्चों के मानसिक विकास के लिए सही बता रहा था। हमारे मित्रों के गुट ने उस समय उससे सब सम्बंध तोड़ लिए थे। बाद में मैंने सुना कि वह अपनी बात से पलट गया है, वह इंकार करता है कि उसने ऐसा कुछ किया था।

डेविड मुझसे करीब बीस साल बड़ा था, अगर वह आज जीवित है तो नब्बे साल का होगा। बहुत सालों से मेरा उससे सम्पर्क नहीं है। लेकिन इसके बारे में मेरे मन में दुविधा है। उसकी जिन किताबों की वजह से लाखों लोगों को लाभ भी हुआ था और आज भी होता होगा, उनके लिए उसके योगदान को कैसे देखा जाये? मैं कई विकलांग लोगों को जानता हूँ जो कहते हैं कि उसकी किताबों में उन्होंने अपना जीवन जीने की राह पाई है।

मी टू - व्यस्कों में सम्बंधों की जटिलताएँ

कुछ वर्ष पहले "मी टू" (मुझे भी) के नाम से यौन दुराचार की बहुत सी बातें बाहर निकलीं, कई लोगों पर आरोप लगे जिसमें बड़ी उम्र के जाने-पहचाने या प्रसिद्ध या उच्चे पद के अफसरों-अधिकारियों ने अपने नीचे काम करने वाली युवतियों को सैक्स के लिए मजबूर किया था। कानूनी जाँच में बहुत से ऐसे आरोप सही निकले और कुछ में आरोपितों को सजा मिली या नौकरी से निकाला गया। कुछ ऐसे आरोप झूठे भी निकले। 

कुछ स्त्रियों का कहना है कि जिस समय यह हादसा हुआ था, यह इतना अप्रत्याशित था कि उस समय वह कुछ नहीं कह पायीं। अगर महिला ने रोका नहीं या स्पष्ट मना नहीं किया तो क्या इसे गलतफहमी का नतीजा भी माना जा सकता है?

यह भी सच है कि नीचे काम करने वाले को दबाव महसूस होता है कि अगर वह ऐसे सम्बंधों को नहीं स्वीकारेंगे तो उनके केरियर पर बुरा असर पड़ेगा। इसलिए कुछ लोग कहते हैं कि इस तरह के सम्बंध हमेशा गलत होते हैं। लेकिन ऐसे कई दम्पत्ति हैं जिनकी जानपहचान और प्रेम साथ में काम करने की वजह से हुए, जब उनमें से एक ऊँचे पदवे पर था और दूसरा नीचे। इसलिए यह सोचना कि ऊँचे और नीचे पद वालों के बीच किसी तरह के सम्बंध नहीं बने, को लागू करना कठिन होगा।

यह भी हो सकता है कि कैरियर में आगे बढ़ने के लिए या किसी लाभ की आशा से कुछ व्यक्ति इस तरह के सम्बंध सोच-समझ कर बनायें, लेकिन बाद में प्रमोशन या लाभ न मिलने पर गुस्सा हो जायें और बदला लेने के लिए कहें कि उनके साथ जबरदस्ती हुई है। यह बात सोच कर मुझे व्यस्क व्यक्तियों के बीच हुए सम्बंधों का मामला अधिक कठिन लगता है। 

समलैंगिक यौन दुराचरण की जटिलतायें

नब्बे के दशक में एक अधेड़ उम्र की नर्स हमारे एक प्रोजेक्ट में काम करने तीन महीने के लिए विदेश गईं। उन्होंने लौट कर मुझसे शिकायत की वहाँ काम करने वाली, उनसे दस वर्ष बड़ी हमारे प्रोजेक्ट की प्रमुख ने उनसे यौन सम्बंध बनाने की कोशिश की। वह चाहती थीं कि हम उस प्रोजेक्ट प्रमुख को नौकरी से निकाल दें। जहाँ तक मुझे समझ में आया शिकायत करने वाली महिला के साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं हुई थी, बल्कि वह सोचती थीं कि लेसबियन होना गलत है और ऐसी औरतों को प्रोजक्ट में ज़िम्मेदारी के पद पर नहीं रखना चाहिए। जबकि मुझे लगा कि लेसबियन होना और व्यस्क महिला से सम्बंध के लिए कहना या पूछना कोई जुर्म नहीं है। अंत में मैंने इस शिकायत के बारे में कुछ नहीं किया।

एक बार भारत में एक कुष्ठआश्रम के काम करने वाली यूरोपीय मूल की नर्स-नन के बारे में भी मुझे यही शिकायत मिली कि वह लेसबियन है। मैं उन्हें बहुत सालों से जानता था और मुझे लगा कि वह बहुत मेहनत तथा प्यार से रोगियों की सेवा करती थीं। मैंने सोचा कि लेसबियन होना अपराध नहीं है, और अगर वह किसी से जबरदस्ती नहीं कर रहीं तो यह उनका निजि मामला है। बाद में मुझे खबर मिली कि उनकी संस्था (कोनग्रेगशन) ने उन्हें संस्था से निकाल दिया है और वह यूरोप वापस लौट आईं।

कुछ साल पहले अमरीकी अभिनेता केविन स्पेसी पर भी कुछ पुरुषों ने आरोप लगाये थे कि कुछ दशक पहले जब वह नाबालिग थे तब स्पेसी ने उनके साथ जबरदस्ती सम्बंध बनाये थे। इन आरोपों की वजह से स्पेसी को कई फिल्मों और सीरियल से निकाल दिया गया, लेकिन बाद में न्यायालय ने उन आरोपों को सही नहीं माना। एक ओर से यह हो सकता है कि इतने पुराने ज़ुर्म को अदालत में साबित करना आसान नहीं है, लेकिन दूसरी ओर यह भी हो सकता है कि प्रसिद्ध और पैसे वाले व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाने का कारण व्यक्तिगत लाभ की आशा हो। 

एक और अनुभव

मेरा तीसरा अनुभव एक यूरोपी पुरुष से जुड़ा है जो करीब बीस साल से अफ्रीका में काम करते थे। उन्होंने वहाँ की महिला से विवाह किया था और उनके बच्चे भी थे, जिनमें वहाँ के कुछ गोद लिए हुए बच्चे भी थे। उन्होंने बहुत से बच्चों को छात्रवृति दिलवा कर यूरोप पढ़ने भेजा था। एक दिन उनके विरुद्ध शिकायत आई कि वह वहाँ अनाथाश्रम के बच्चों से यौन सम्बंध बनाते हैं। इस बात की जाँच के लिए वहाँ एक व्यक्ति को भेजा गया। तीन सप्ताह तक उस व्यक्ति ने वहाँ के बच्चों से, वहाँ काम करने वालों से, आदि से साक्षात्कार किये, और इस बारे में प्रश्न पूछे। पता चला कि आरोप लगाने वालों में कुछ लोगों का उनसे झगड़ा हुआ था, लेकिन किसी बच्चे से इसके बारे में बातचीत से कोई संदेहजनक बात नहीं निकली। आखिर में कुछ सबूत नहीं मिलने से यह जाँच बंद कर दी गयी और उनके विरुद्ध कुछ कार्यवाही नहीं की गई।

इस बात के चार-पाँच साल के बाद उस देश की सरकार ने उन्हें अपने देशवासियों की सेवा के लिए विषेश पुरस्कार दिया। इस बात को बीस-पच्चीस साल हो गये हैं और वह सज्जन, जो अब वृद्ध हैं, आज भी उसी देश में रहते हैं और उसी अनाथाश्रम में स्वयंसेवक की तरह काम करते हैं।

सच कहूँ तो आज भी मेरे मन में इस घटना के बारे में दुविधाएँ हैं, हालाँकि उनके अपने गोद लिए हुए बच्चे, जो अब व्यस्क हैं, कहते हैं कि उनके पिता पर लगे आरोप झूठे थे। आप बताईये कि आप इस मामले में क्या करते?

अंत में

मेरे लिए, व्यक्तिगत स्तर पर, इस विषय पर सबसे बड़ी दुविधा का कारण है कि जहाँ बलात्कार जैसे सबूत नहीं हों, किसी पर लगे आरोपों को कैसे जाँचा जाये? बाद में मन में संदेह रह जाता है, उसे निकालना असम्भव होता है, तो यह लगता है कि आरोप लगाना बहुत आसान है, लोग कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू है कि जब कोई औरत, अतीत में हुई किसी बात को बताती है, तो उसके लिए यह कहना आसान नहीं होता, उसे कैसे गम्भीरता से न लिया जाये?

अंत में बात घूम-फ़िर कर वहीं आ जाती है कि उपन्यासों, फ़िल्मों या अखबारों या फेसबुक में यह बातें आसान लग सकती हैं, कि यह हुआ, ऐसा या वैसा करना चाहिए था। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में कुछ भी लिखना आसान है। लेकिन जब आप को निर्णय लेना पड़े तो यह कभी-कभी बहुत कठिन हो सकता है। 

पटना की घटना से जुड़ी बहस पर साहित्यकारों और साहित्य की बात करते हुए, मित्र ओम थानवी ने लिखा है, "अच्छा या बड़ा लेखक जाति, विचार, चरित्र, आचरण के बावजूद अच्छा या बड़ा होता है। कम-से-कम इस तरह के आधारों पर उसे त्याज्य या उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता।" कुछ यही बात अन्य क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए भी कही जा सकती है।

आप बताईये आप इस विषय के बारे में क्या सोचते हैं? 

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